Vestigial Consciousness
Ramblings about that which has befallen the Human kind, reducing consciousness to a vestige.

यारा, मौला…

यारा, मौला,

यारा… हो… मौला…

हाँ हाँ यादों में है अब भी क्या सुरीला वो जहां था,

हमारे हाथों में रंगीन गुबार थे और दिल में महकता समाँ था,

यारा… हो… मौला….

वो तो ख्वाबों की थी दुनिया, वो किताबों की थी दुनिया,

सांस में थे मचलते हुए ज़लज़ले आँख में वो सुहाना नशा था,

वो ज़मीन थी आसमान था, हमको लेकिन क्या पता था,

हम खड़े थे जहां पर उसी के किनारे पे गहरा सा अँधा कुआँ था|

फिर वो आये भीड़ बन कर, हाथ में थे उनके खंजर,

बोले फेंको ये किताबें, और संभालो ये सलाखें,

ये जो गहरा सा कुआँ है, हाँ हाँ अँधा तो नहीं है,

इस कुँए में है है खजाना, कल की दुनिया तो यही है,

कूद जाओ ले के खंजर, काट डालो जो हो अन्दर,

तुम ही कल के हो शिवाजी, तुम ही कल के हो सिकंदर…

हमने वो ही किया जो उन्होंने कहा क्यूंकि उनकी तो ख्वाहिश यही थी,

हम नहीं जानते ये भी क्यूँ ये किया क्यूंकि उनकी फरमाईश यही थी,

अब हमारे लगा जायका खून का अब बताओ करें तो करें क्या,

नहीं है कोई जो हमें कुछ बताये बताओ करें तो करें क्या?

- पियूष मिश्रा

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