रटंत विद्या
रटत घोटत जुग भया, लिया न मौलिक ज्ञान;
संगणक इस संसार में सारे, बचा न एक इंसान|
तत्त्व तत्त्व छाडी रहे, अंकों में उलझे बिद्वान;
हर उल्लू लक्ष्मी को धाये, चाहे जगत प्रमाण|
अज्ञानी, फकीर हैं हम, यही है परम ज्ञान;
फूस छांट बंधू मेरे, सरस्वती को पहचान|
जो यह मूल धर्म पहचाने, करे जगत कल्याण;
कहत पार्थ सुनो भाई साधो, वही होवे महान||
- संतासुर पार्थ “फुक्कड़”
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Categories: Human Behaviour, Poetry
ISB, knowledge, Poems




nice composition.