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Archive for the ‘Self’ Category

हाल चाल ठीक ठाक है

अकस्मात् कुछ दिनों से बचपन के दिनों की गर्मी की छुट्टी सा आभास हो रहा है – अरसे बाद घर पे खाली जो बैठा हूँ| और मेरा दिमाग तो फिर वैसे भी शैतान का घर है तो अगर खाली हो तो क्या होगा ये आप सोच ही सकते हैं…

कई दोस्तों का यह प्रश्न है की आखिर मैं कर क्या रहा हूँ, तो सुनिए (अब सीधे सीधे जवाब दे दूंगा तो मैं मैं कहाँ रह जाऊंगा – आखिर ‘हैं और भी दुनिया में सुखनवर…’)
वैसे तो अजय नायर और मैं अरसे से यह गाना इसी अंदाज़ में गुनगुनाया करते हैं किन्तु शब्द इतने सटीक पहले शायद नहीं थे – सब वक़्त का फेर है|
शब्दों के फेर पे गौर कीजियेगा, शब्द-ब-शब्द यही आलम है (पूरे मज़े के लिए गीत सुनते सुनते आगे पढ़ें):
“हाल चाल ठीक ठाक है, सब कुछ ठीक ठाक है; बी.ऐ. किया है, एम्.बी.ऐ. किया, लगता है वो भी ऐंवें किया; काम नहीं है वरना यहाँ, आपकी दुआ से बाकी ठीक ठाक है…”
अब बेकाम बैठे आधुनिक सदी के इंसान का हाथ टीवी के रिमोट की ओर चला ही जाता है… कहने को तो टीवी पर हैं चैनल दो सौ, किन्तु यदि गीतावली या चित्रहार के कार्यक्रम देखता हूँ तो लगता है की साहिर लुधियानवी की आत्मा तड़पती होगी मल-मूत्र निकास के विषय पे गीत सुन के| नाक भौं सिकोड़ के अगर वास्तविक टेलिविज़न के चैनल लगाऊं तो… माफ़ कीजियेगा, किन्तु बिना अपशब्द कहे मेरी भावना पूरी तरह उजागर नहीं होगी… चू%^%$ का ऐसा जमघट देखने को मिलता है की मुझे जापानी सभ्यता और हारा-किरी की याद आने लगती है| ले दे के अगर कुछ देखा जा सकता है तो बस समाचार, जिनसे देश-दुनिया का आलम कुछ यूँ जान पड़ता है:
“आब-ओ-हवा देश की बहुत साफ़ है; कायदा है, कानून है, इन्साफ है; अल्लाह मियाँ जाने कोई जिए या मरे; आदमी को खून वून सब माफ़ है;”
भ्रष्टाचार का ऐसा बोल-बाला है की:
“और क्या कहूँ, छोटी मोटी चोरी, रिश्वतखोरी देती है अपना गुज़ारा यहाँ; आपकी दुआ से बाकी ठीक ठाक है…”
अगर सनसनीखेज समाचारों से नज़र हटा के व्यापार की दुनिया, (जिसमें मेरी महारथ अब एक कागज़ का टुकड़ा ऐलानिया विस्थापित कर रहा है) की ओर घुमाऊं तो कुछ यूँ समझ में आता है की निवेश के मामले में दाल अब भी गीली ही है, (पर फिर भी माता पिता ज्ञान तो देते ही रहते हैं):
“बाज़ारों के भाव मेरे ताऊ से बड़े; मकानों पे पगड़ी वाले ससुर खड़े; बुड्ढी भूख मरती नहीं जिंदा है अभी;”
अब “कोई इन बुजुर्गों से कैसे लड़े”;
और जब बाज़ारों का हाल हो ठंडा तो व्यापार की दुनिया पर भी वही खबरें आती हैं – कभी मल्लिका-ए-हिंद क्या बोलीं, तो कभी नवरात्रि के आड़ में अनशन पर बैठे हज़ारों लोग क्या बोले:
“और क्या कहूं, रोज़ कोई मीटिंग, रोज़ कोई भाषण, भाषण पे राशन नहीं है यहाँ; आपकी दुआ से बाकी ठीक ठाक है…”
निराश हो कर टीवी बंद कर देता हूँ और बैठ के भविष्य के बारे में, ख़ास कर रोज़गार के बारे में सोचता हूँ तो वही कहावत याद आती है की ‘शहर बसा नहीं, लुटेरे पहले आ गए’ – आमदनी अट्ठन्नी, खर्चा रुपैय्या; अगली पंक्तियाँ इसी भाव को उजागर करती हैं की आने वाली लक्ष्मी से आधी आमदनी सरकार खा जायेगी और बची खुची महंगाई:
“गोल मोल रोटी का पहिया चला, पीछे पीछे चांदी का रुपैया चला; रोटी तो बिचारी को चील ले गयी, चांदी ले के मुह काला कौवा चला;”
और जो एक दफा पुनः काम पे लग गया, तो तो फिर हो चुका बंटाधार – दिनचर्या का कार्यक्रम शुरू हो जाएगा – सुबह से शाम और शाम से सुबह:
“और क्या कहूँ, मौत का तमाशा, चला है बेतहाशा; जीने की फुर्सत नहीं है यहाँ, आपकी दुआ से बाकी ठीक ठाक है…”
इसलिए अब सोचना, देखना, सुनना छोड़ कर किताबों की ओर रुख कर रहा हूँ, कम से कम उनकी काल्पनिक दुनिया, इस वास्तविकता से तो कोसों बेहतर है|
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Categories: Hindi Lyrics, Self

दुनिया

ओ री दुनिया, ओ री दुनिया…

ऐ ओ री दुनिया….

 

सुरमई आँखों के प्यालों की दुनिया ओ दुनिया,

सुरमई आँखों के प्यालों की दुनिया ओ दुनिया,

सतरंगी रंगों गुलालों की दुनिया ओ दुनिया,

सतरंगी रंगों गुलालों की दुनिया ओ दुनिया,

अलसाई सेजों के फूलों की दुनिया ओ दुनिया रे,

अंगडाई तोडे कबूतर की दुनिया ओ दुनिया रे,

ऐ करवट ले सोयी हकीकत की दुनिया ओ दुनिया,

दीवानी होती तबियत की दुनिया ओ दुनिया,

ख्वाहिश में लिपटी ज़रुरत की दुनिया ओ दुनिया रे,

ऐ इंसान के सपनों की नीयत की दुनिया ओ दुनिया रे,

 

ओ री दुनिया, ओ री दुनिया,

ओ री दुनिया, ओ री दुनिया,

ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है,

ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है…

 

ममता की बिखरी कहानी की दुनिया ओ दुनिया,

बहनों की सिसकी जवानी की दुनिया ओ दुनिया,

आदम के हवा से रिश्ते की दुनिया ओ दुनिया रे,

ऐ शायर के फीके लफ्जों की दुनिया ओ दुनिया रे,

 

ओSSSSSSSSSSSSSSSSSSSSSSSSSSSSS

 

गा़लिब के मोमिन के ख्वाबों की दुनिया,

मजाज़ों के उन इन्कलाबों की दुनिया,

गा़लिब के मोमिन के ख्वाबों की दुनिया,

मजाज़ों के उन इन्कलाबों की दुनिया,

फैज़े, फिराकों, साहिर व मखदूम,

मीर, किज़ौक, किताबों की दुनिया,

ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है,

ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है…

 

पल छिन में बातें चली जाती हैं हैं,

पल छिन में बातें चली जाती हैं हैं,

रह जाता है जो सवेरा वो ढूंढें,

जलते मकान में बसेरा वो ढूंढें,

जैसी बची है वैसी की वैसी बचा लो ये दुनिया,

अपना समझ के अपनों के जैसी उठा लो ये दुनिया,

छिट पुट सी बातों में जलने लगेगी संभालो ये दुनिया,

कट कुट के रातों में पलने लगेगी संभालो ये दुनिया,

ओ री दुनिया, ओ री दुनिया,

 

वो कहें हैं की दुनिया ये इतनी नहीं है,

सितारों से आगे जहां और भी हैं,

ये हम ही नहीं हैं वहाँ और भी हैं,

हमारी हर एक बात होती वहीँ हैं,

हमें ऐतराज़ नहीं हैं कहीं भी,

वो आलिम हैं फ़ाज़िल हैं होंगे सही ही,

मगर फलसफा ये बिगड़ जाता है जो वो कहते हैं,

आलिम ये कहता वहां इश्वर है,

फ़ाज़िल ये कहता वहाँ अल्लाह है,

काबिल यह कहता वहाँ ईसा है,

मंजिल ये कहती तब इंसान से तुम्हारी है तुम ही संभालो ये दुनिया,

ये बुझते हुए चाँद बासी चरागों, तुम्हारे ये काले इरादों की दुनिया,

 

हे ओSSSS री दुनिया, ओSSSS री दुनिया, ओ री दुनियाSSSSSS…

यारा, मौला…

यारा, मौला,

यारा… हो… मौला…

हाँ हाँ यादों में है अब भी क्या सुरीला वो जहां था,

हमारे हाथों में रंगीन गुबार थे और दिल में महकता समाँ था,

यारा… हो… मौला….

वो तो ख्वाबों की थी दुनिया, वो किताबों की थी दुनिया,

सांस में थे मचलते हुए ज़लज़ले आँख में वो सुहाना नशा था,

वो ज़मीन थी आसमान था, हमको लेकिन क्या पता था,

हम खड़े थे जहां पर उसी के किनारे पे गहरा सा अँधा कुआँ था|

फिर वो आये भीड़ बन कर, हाथ में थे उनके खंजर,

बोले फेंको ये किताबें, और संभालो ये सलाखें,

ये जो गहरा सा कुआँ है, हाँ हाँ अँधा तो नहीं है,

इस कुँए में है है खजाना, कल की दुनिया तो यही है,

कूद जाओ ले के खंजर, काट डालो जो हो अन्दर,

तुम ही कल के हो शिवाजी, तुम ही कल के हो सिकंदर…

हमने वो ही किया जो उन्होंने कहा क्यूंकि उनकी तो ख्वाहिश यही थी,

हम नहीं जानते ये भी क्यूँ ये किया क्यूंकि उनकी फरमाईश यही थी,

अब हमारे लगा जायका खून का अब बताओ करें तो करें क्या,

नहीं है कोई जो हमें कुछ बताये बताओ करें तो करें क्या?

– पियूष मिश्रा

आरम्भ है प्रचंड…

March 3, 2009 1 comment

आरम्भ है प्रचंड, बोले मस्तकों के झुंड, आज ज़ंग की घडी की तुम गुहार दो,

आन बान शान, या की जान का हो दान, आज एक धनुष के बाण पे उतार दो!

आरम्भ है प्रचंड…

मन करे सो प्राण दे, जो मन करे सो प्राण ले, वही तो एक सर्वशक्तिमान है,

कृष्ण की पुकार है, यह भागवत का सार है कि युद्ध ही तो वीर का प्रमाण है,

कौरवों की भीड़ हो या पांडवों का नीड़ हो जो लड़ सका है वो ही तो महान है!

जीत कि हवस नहीं, किसी पे कोई वश नहीं, क्या ज़िन्दगी है ठोकरों पे वार दो,

मौत अंत है नहीं, तो मौत से भी क्यों डरें, यह जा के आसमान में दहाड़ दो!

आरम्भ है प्रचंड…

वो दया का भाव, या कि शौर्य का चुनाव, या कि हार का वो घाव तुम यह सोच लो,

या कि पूरे भाल पे जला रहे विजय का लाल, लाल यह गुलाल तुम यह सोच लो,

रंग केसरी हो या, मृदंग केसरी हो या कि केसरी हो ताल तुम यह सोच लो!

जिस कवि कि कल्पना में ज़िन्दगी हो प्रेम गीत, उस कवि को आज तुम नकार दो,

भीगती मसों में आज, फूलती रगों में आज, आग कि लपट का तुम बघार दो!

आरम्भ है प्रचंड…

आरम्भ है प्रचंड…

आरम्भ है प्रचंड…

-पियूष मिश्रा

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The Man who wanted to know Everything

December 7, 2008 1 comment

It was the year 1460 Anno Domini, when a man set out to learn about himself; the first modern mind, perhaps the greatest ever. A man, whose thirst for knowledge was unparalleled. A mind that knew no bounds. It is very hard to humble me; harder still to make me believe there is something I can not do. Despite this, at the outset, I know I will never be anywhere close to the genius that this world witnessed in the corporeal form of a Man, who wanted to know everything: Leonardo Da Vinci.

This memory of the great man was triggered by a documentary on him that I happened to watch a few days back; it has been haunting me ever since. The following are excerpts from a most humbling and moving documentary on Leonardo by BBC. These may not quotes by the great mind himself but they are so beautiful and reflective of the genius of Leonardo that I choose to ascribe them to him.

“I will do things no one in the past has dared to do. I will think new thoughts and bring new things into being.”

“Do not pity the humble painter, he can be the lord of all things, whatever exists in the universe, he has first in his mind, then in his hand.”

“Do you see how the eye embraces the beauty of the whole world? It is the window of the soul, it informs the arts, it is the foundation of science, it measures the distance of the stars, it discovers the elements, it is the inventor of architecture and the divine art of painting.”

“A bird should be able to do what its nature dictates, so should a man; if he has the mind to take wings. Once you have tasted flight, you will forever walk the world with your eyes faced skywards, for there you have been, and there you shall always long to be.”

“Most men can’t make the journey they need to take to find out the truth. But if you want to follow where the light of truth leads, you have to get through.”

“While I thought I was learning how to live, I was really been learning how to die. As a day well spent brings happy sleep, so a life well used brings contended death.”

“Do not pity the humble painter, he can be the lord of all things, whatever exists in the universe, he has first in his mind, then in his hand. By his art, he may be called the grand child of God.”

These profound words and many more, left me back at the same place where I have been several times. It is almost a season for me to come and revisit these thoughts:

Is it really possible for a man to do so much in a lifetime? Is there a way that I can live my life and know anywhere as close? Are these questions of any significance? What is the worth of knowledge and where does it fit in the over all scheme of things?

If I could boil my life, the distillate would be this: The Man who wanted to know everything. And yet, the realization that I would never know everything is one that is very hard to over look. It can be greatly and in my opinion correctly argued that a mind at rest understands that the greatest knowledge is that we know nothing. Yet, I wish to know all there is to know. All the lies, all the truths, all the world’s great promises and the deceits, all the love stories and those of hate and of all the great men and those who were utterly insignificant. I know naught whether a man’s quest for his personal reasons is of any consequence, but then I do not know if there is anything of consequence. Should a life then be spent in pursuit of greater good for the greatest number? Or should it be spent in one’s own pursuit of euphoria? I am one of those who believe every man pursuing his own euphoria will lead to the greatest good for the greatest number. Nothing phenomenal about the observation, probably a restatement of the ideas presented through several centuries by many great men.

From this perspective, we can see that we need to find out what way and where to does the pursuit of our euphoria takes us. And it is extremely likely that I shall spend the rest of my life trying to find an answer to this question. Yet, whatever it is that the path, the process and the destination (or the absence of one) holds for me, it shall be about learning about myself. And I may never finish the journey, rather in all probability, I will not; but I shall consider it worthwhile to have had the privilege of being given the chance and having taken the road.

I know the answers I seek, I don’t know the questions I must ask to get those answers. And the questions that I do know, I have no clue about what answers should I regard as the correct ones.

I Will let these thoughts be. Maybe the sleep will de-fog my brain. But as I turn to lay myself to sleep; all I can think about is: “was this a day well spent?”

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The Social Web is Narcissistic

August 28, 2008 2 comments

…and at its heart is an Egotist – You.

Disclaimer: The thoughts about this article are still extremely hazy and maybe I’ll refine it in some time but I think this deserves some thought. This is an Old Draft but I still decided to publish it.

Ajay, a friend and a mentor @ work and I were having our regular cup of coffee this afternoon when it all started. For long have I been asking him to get onto the Social Web and he has been reluctant about it for no declared reason. The guy has a Twitter Id which he barely uses citing excuses of wanting to avoid an addictive distraction – something I can’t refute; and uses no other networking service. Well today, I got him talking, nudging him to point what he sees wrong with the Web as it has become. To set some context, We’ve both long wondered that there is something seriously wrong with the way the world is headed; I have been optimistic about the Web, thus far.

“Well”, Ajay said, “it promotes unjust Narcissism.” And then i realized the direction his reluctance was coming from… Both Ajay and I are severely Narcissistic guys – We Still believe we are the centers of universe and the Sun revolves around us. Not the world, just a few of us… But it isn’t Narcissism at a personal level, it is narcissism at a mass level that should raise a concerning eyebrow – Because it promotes Amateurism at a mass level. And Narcissistic Noobs is something most of us can’t put up with and shouldn’t, to be true.

The Social Web, is built around the construct of ‘Me’. It is an immediate instance of the act of Consumption of the Self. There is this need for this ‘Me’ to be consumed – in all forms. (More in this direction later). An old observation of mine on similar lines came when I was wondering about the Testimonials on the social sites. No matter who this ‘Me’ is, there are people to promote ‘Me’, to vouch for ‘Me’, who think ‘Me’ is good, great, fantabulous. ‘Me’ is happy, and ‘Me’ genuinely believes he is great and this continues. Eventually this leads to a degeneration of the Web – let alone Information, most content isn’t even Data for me, just Noise.

Despite all of this, I still believe Web 2.0 promises me a great way of information discovery. In potential, I can control exactly what I let seep through to me, what I allow myself to expose myself to. It will all start with amateurism, but I feel Amateurs at some point of time will evolve, those who don’t will perish. Eventually, the fittest will survive. Ajay doesn’t quite agree with me; Natural Selection scares him – Amateurs will promote Amateurs and the circle of the thoughtful will be left tiny and insignificant in the grand scheme of things. I’m hoping I get to see him wrong on this.

Do you feel the Web 2.0 Shall evolve to a sea of information or do you think Noise will inundate the information by far?

Buckle Up Dorothy

“And if you say this life ain’t good enough; I would give my world to life you up; I could change my life to better suit your mood… Cause you are SO SMOOTH!”

I’m Back… No Bangs, just silently… discreetly.

And it has begun with loads of new pics upped on Flickr.

Keep a watch for the fun on this space.

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