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रटंत विद्या

May 29, 2010 1 comment

रटत घोटत जुग भया, लिया न मौलिक ज्ञान;

संगणक इस संसार में सारे, बचा न एक इंसान|

तत्त्व तत्त्व छाडी रहे, अंकों में उलझे बिद्वान;

हर उल्लू लक्ष्मी को धाये, चाहे जगत प्रमाण|

अज्ञानी, फकीर हैं हम, यही है परम ज्ञान;

फूस छांट बंधू मेरे, सरस्वती को पहचान|

जो यह मूल धर्म पहचाने, करे जगत कल्याण;

कहत पार्थ सुनो भाई साधो, वही होवे महान||

– संतासुर पार्थ “फुक्कड़”

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